डाक्टर ने तो बताया नहीं कि डाक्टर बनो, चाहे तो….

protest against medical fees hike in uttarakhand

उत्तराखंड पहली बार ‘डबल इंजन’ की रफ्तार से दौड़ रहा है। ‘जीरो टालरेंस’ की दुहाई दी जा रही है। मजाल है कि भ्रष्टाचार करने का का ख्याल भर भी किसी के जेहन में आ जाए। सरकार सूबे की भलाई के लिए ‘कड़े फैसले’ ले रही है। पहाड़ी राज्य के गठन के 17 साल बाद अब तक के सबसे बड़े सियासी काफिले के साथ चलती सरकार छह दिनों तक, जी हां, पूरे छह दिनों तक पहाड़ में विकास के पहाड़े पढ़ रही है।

अब इतनी तेज रफ्तार में चलना है तो कुछ ‘कुर्बानियां’ तो देनी ही होंगी। क्या हुआ अगर सरकार ने मेडिकल कॉलेजों को फीस निर्धारण का अधिकार दे दिया? आखिर डबल इंजन का इतना अधिकार तो बनता ही है। अपने बच्चों को डाक्टर बनाने का ख्वाब यूं तो मिडिल क्लास सोच समझ कर ही और बिस्तर, तकिए, नींद से पूछ कर ही देखता है। और अगर ख्वाब में इच्छाएं कुछ आगे पीछे कर गईं तो ये अलग बात है कि मां बाप अपने बच्चों को विजय माल्या और नीरव मोदी से कम लोन लेकर ही पढ़ाने की कोशिश कर लेते थे। लेकिन अब सरकार ने ना सिर्फ ऐसे मिडिल क्लास मां बाप को नींद से उठा दिया है बल्कि उनके ख्वाबों को भटकने से रोक भी दिया है। अब कितना भी मखमली बिस्तर मिल जाए, उत्तराखंड में लोग अपने बच्चों को डाक्टर बनाने का सपना तो नहीं ही देख पाएंगे। इसे कहते हैं जीरो टालरेंस। अरे नहीं नहीं, ‘सख्त फैसले’।

आखिरकार मेडिकल कॉलेज खोलने वाले ‘निवेशकों’ का ‘हित’ भी तो डबल इंजन की ही जिम्मेदारी है। क्या हुआ अगर 57 का आंकड़ा जनता ने दिया, चुनाव लड़ने का ‘मैनेजमेंट’ तो ‘निवेशकों’ से ही हुआ। फिर सरकार को तो पता ही है कि मेडिकल कॉलेजों को खोलने में 700 – 800 करोड़ का ‘निवेश’ किया गया है। फिर डाक्टर ने तो कहा नहीं कि डाक्टर बनो चाहे तो …..फिर भी दिल ना माने तो कई जगहों पर 100 फीट का तिरंगा भी सरकार फहरा रही है।

अब लोगों की तो आदत है सरकार के ‘कड़े फैसलों’ पर सवाल उठाने की। ऐसा तो है नहीं कि ये राज्य में आर्थिक गुलामी के दौर की शुरुआत है। लोग लोन लेंगे तो बैंकों को भी काम मिलेगा। अब कोई डाक्टर बनने के बाद मरीजों की लिस्ट दिखाकर विदेश भी तो नहीं भागेगा। वो तो सरकार के आदेश से दूर सुदूर उत्तराखंड की कंदराओं में बूढ़े बुजुर्गों की सेवा करेगा।

खामख्वाह की आदतें मिडिल क्लास लोगों को नहीं पालनी चाहिए। जब सरकार ‘मनसा, वाचा, कर्मणा’ से प्रदेश के ‘हित’ में लगी हो तो उसका साथ देना ही पड़ता है। फिर जनता का लिहाज भी तो देखिए कितना किया, मेडिकल की पढ़ाई की फीस बढ़ाई 400 फीसदी लेकिन विधायकों की सेलरी तो 120 फीसदी ही बढ़ाई ना। है ना।

तो बोलिए डबल इंजन की…

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