देहरादून : सेना दिवस पर शहीद मेजर चित्रेश बिष्ट को मिला सेना मेडल, भावुक हुए पिता

देहरादून : वो दिन आखिर कौन भूल सकता है जब पुलवामा हमले में देश के 45 जवान शहीद हो गए और उसके कुछ ही दिन बाद बम डिफ्यूज करते समय ब्लास्ट से मेजर चित्रेश बिष्ट और आतंकियों से लोहा लेते हुए देहरादून के ही मेजर वीएस ढौंडियाल शहीद हुए। घर, मोहल्ले पूरे प्रदेश की जनता भावुक हो गई थी। पूरे देहरादून में पाकिस्तान मुर्दाबाद और शहीद अमर रहे के नारे गूंजे थे.

मेडल लेते हुए पिता हुए भावुक

वहीं बीते दिन सेना दिवस पर देहरादून के नेहरु कॉलोनी निवासी शहीद मेजर चित्रेश बिष्ट को मरणोपरांत ‘सेना मेडल’ मिला। ये मेडल सेना दिवस पर दिल्ली में आयोजित एक कार्यक्रम मे थलसेना प्रमुख जनरल मनोज मुकुंद नरवणे ने शहीद चित्रेश बिष्ट के पिता सुरेंद्र सिंह बिष्ट को सौंपा। इस दौरान शहीद के पिका भावुक हो गए। उनकी आंखे नम हो गई। लेकिन उन्हें गर्व है अपने बेटे पर जिसने देश के लिए अपने प्राणों की आहूति दी। पिता को बेटे के जाने का दुख तो है लेकिन गर्व भी है कि उनके बेटे ने देश की हिफाजत के लिए सबकी आंखें नम करके चला गया।

बम डिफ्यूज करने में माहिर थे शहीद चित्रेश बिष्ट

गौर हो कि देहरादून के ओल्ड नेहरू कॉलोनी निवासी शहीद चित्रेश बिष्ट पिछले साल 16 फरवरी को रजौरी के नौशेरा सेक्टर में हुए आइईडी ब्लास्ट में शहीद हो गए थे। एलओसी क्रॉस पर आतंकियों द्वारा आइईडी लगाने की सूचना पर शहीद चित्रेश बिष्ट समेत सेना के जवानों ने सर्च ऑपरेशन चलाया। इंजीनियरिंग कोर में तैनात मेजर चित्रेश बिष्ट ने आइईडी डियूज्ड करने में माहिर थी। वो अब तक कई आइईडी बम डिफ्यूज कर चुके थे लेकिन उस दिन बम डिफ्यूज करने के दौरान उन्होंने बम विरोधी जैकेट नहीं पहनी थी जिस कारण वो बुरी तरह घायल हो  जिसके बाद उन्हें अस्पताल लेज जाया गया जहां उन्होंने दम तोड़ दिया।

छुट्टी आने वाले थे घर, 7 मार्च को थी शादी

बता दें कि शहीद मेजर चित्रेश बिष्ट(28) मूलरूप से अल्मोड़ा जिले के रानीखेत तहसील के अंतर्गत पिपली गांव के रहने वाले थे जिनका परिवार वर्तमान में देहरादून के ओल्ड नेहरू कॉलोनी में रहता है। शहीद चित्रेश ने आईएमए से 2010 में पास आउट किया था. वो बम डिफ्यूज करने में माहिर थे. उनके पिता सुरेंद्र सिंह बिष्ट उत्तराखंड पुलिस से इंस्पेक्टर पद से रिटायर हैं। लोगों की आंखें तब ज्यादा नम हो गई जब जानकारी मिली कि शहीद होने के कुछ दिन बाद 28 फरवरी को वो छुट्टी आने वाले थे औऱ उनकी शादी की तैयारी चल रही थी। शहीद की शादी 7 मार्च को होने थी। माता-पिता शादी की तैयारी कर रहे थे। पिता रिश्तेदारों को शादी का कार्ड बांटने में व्यस्त थे कि तभी बेटे की शहीदी की खबर आई जिससे कोहराम मच गया। पूरा देहरादून रोया। लोगों ने जमकर पाकिस्तान के खिलाफ नारे लगाएथे। शहीद की शहादत को कभी भुलाया नहीं जा सकता।

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