अफसरशाही बनाम नेतागिरी: झगड़ा पुराना, वही तराना, क्या आना, क्या जाना?

उत्तराखंड में एक बार फिर से नेतागिरी और अफसरशाही में डाल डाल तो पात पात वाली स्थिती हो गई है। नेता कहते हैं कि अफसर सुनते नहीं और अफसर कहते हैं कि नेताओं को याद नहीं रहता। पिछले दो हफ्ते में दो ऐसी घटनाएं हुईं जिनसे अफसरों और नेताओं के बीच तलवारें खिंची हुई लगती हैं।

पहली घटना राजेश शुक्ला को लेकर हुई। राजेश शुक्ला किच्छा से बीजेपी के विधायक हैं उनके इलाके में एक युवती की मौत इलाज के लिए जगह जगह भटकने में हो गई। विधायक जी ने अधिकारियों के खिलाफ मोर्चा खोला। धरने पर बैठे, चिट्ठी लिखी। बाद में समीक्षा बैठक के दौरान इलाके के डीएम को खरी खोटी सुना दी वो भी कैमरे के सामने। हालात इतने बिगड़े कि कैबिनेट मंत्रीव मदन कौशिक की मौजूदगी में चल रही मीटिंग को भी छोड़ कर चले गए। विधायक राजेश शुक्ला ने दावा किया कि वो डीएम के व्यवहार के संबंध में विधानसभा अध्यक्ष को विशेषाधिकार नोटिस देंगे। उन्होंने नोटिस दे भी दी है। अब इस नोटिस पर विधानसभा अध्यक्ष को फैसला लेना है।

दूसरा मसला कुछ ताजा है और गंभीर भी। दरअसल राज्य के कैबिनेट मंत्री मदन कौशिक मीटिंग लेने पहुंचे। मीटिंग में विभागों के सचिवों को बुलाया गया। मीटिंग के बारे में अधिकारियों को पहले से सूचित किया गया था। लेकिन हुआ ये कि मंत्री जी मीटिंग में पहुंच गए और अफसर पहुंचे नहीं। बस फिर क्या था? मंत्री जी भड़क गए। अब मंत्री जी भड़कें और देहरादून में बैठकर भड़कें तो मामला तूल तो पकड़ना ही था। मंत्री जी ने नेतागिरी वाले अंदाज में कैमरे के सामने ही डपट लगा दी। साफ साफ कह दिया कि अफसर आएंगे तो मीटिंग होगी। इतना कह कर वो भी मीटिंग छोड़ कर चल दिए।

दोनों ही घटनाओं में मदन कौशिक मौजूद हैं। एक जगह उन्होंने अपनी पार्टी के विधायक को मीटिंग छोड़ते हुए देखा तो दूसरी घटना में उन्होंने खुद ही मीटिंग छोड़ी।

अब कुछ दिन पहले की घटना याद कीजिए। सरकार ने सभी अफसरों को निर्देश दिए थे वो खुद को जनप्रतिनिधि न समझें। लिहाजा जब जनप्रतिनिधि उनके कमरे में आए तो खड़े होकर उनका अभिवादन करें और बातों को गंभीरता से लें। जनप्रतिनिधि जब कमरें से जाएं तो भी अफसरों को खड़ा होने के लिए कहा गया। सरकार ने कहा कि अगर किसी जनप्रतिनिधि का फोन आए तो प्राथमिकता से उठाएं। न उठा पाएं तो समय मिलते ही कॉल बैक करें।

सरकार ने बाकायदा इस संबंध में लिखित आदेश जारी किए और सभी विभागाध्यक्षों को ये पत्र भेजा गया और अमल करने के लिए कहा गया। अब इस आदेश का दूसरा पहलु भी देखिए। क्या राज्य में हालात ऐसे हो गए हैं कि अब अफसरों को जनप्रतिनिधियों के साथ कैसे सामान्य अभिवादन करने है ये भी बताना पड़े। वो भी IAS और PCS कैडर के अधिकारियों को? उस कैडर को जो पढ़ाई ही इस बात की करते हैं। उस कैडर को जो ट्रेनिंग ही इस बात की लेता है कि उसे जनता और जनप्रतिनिधियों के साथ कैसे संबंध रखने हैं।

 

जी, सही जा रहें हैं। दरअसल ये उत्तराखंड का पुराना रोग है। यहां हर सरकार में ऐसा ही होता रहा है। अफसर और सरकार अपनी अलग अलग बंसी बजाते रहें हैं। सरकार कहती है हरा तो अफसर को पसंद आता है लाल। इस सरकार में पिछली कुछ घटनाएं ऐसा ही इशारा कर रहीं हैं। अफसरों की मनमानी और नेताओं की जुबानी पर कोई लगाम फिलहाल लगती नहीं दिख रही है। हाल में वन विभाग में स्थानानंतरण का एक मसला भी लगे हाथ याद कर लीजिए। सरकार से अफसरों ने 22 पदों पर ट्रांसफर की इजाजत ली और कर दिए 37 ट्रांसफर। सरकार को भी तब पता चला जब ट्रांसफर होने के बाद खबर मीडिया में आई। इसके बाद सरकार ने अफसरों से पूछा कि इजाजत तो 22 ट्रांसफर की ली और कर दिए 37, ऐसा कैसे हुआ। आनन फानन में अगले ही दिन संख्या से अधिक ट्रांसफर वापस कर लिए गए।

तो ऐसा है उत्तराखंड में अफसरों और नेताओं का तानाबाना। हर बार अफसरों के लिए सरकार आदेश जारी करती है, हर बार अफसर उन आदेशों पर आगे बढ़ते हैं लेकिन फिर भी कुछ समय बाद फिर से आदेश जारी करने की जरूरत पड़ जाती है। तो देखते रहिए कि इस बार इस तराने में क्या नया फसाना लिखा जाता है।

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