
उत्तराखंड कांग्रेस पर मित्र विपक्ष होने का आरोप बार-बार लगता है। यानी ऐसा विपक्ष जो सरकार को घेरने की जगह उसे राहत देने का काम करे। उधमसिंह नगर में किसान आत्महत्या का ताज़ा मामला इस आरोप को और मजबूत करता दिख रहा है।
काशीपुर में किसान आत्महत्या मामले पर भी कांग्रेस ने की ढिलाई
बता दें शनिवार देर रात काशीपुर एक एक किसान सुखवंत सिंह ने हल्द्वानी में आत्महत्या कर ली थी। जिसके बाद उनका परिवार सड़क पर उतर गया और सरकार से इंसाफ की मांग कर आरोपियों के खिलाफ कार्रवाई की मांग करने लगा। यही नहीं बात यहां तक पहुंच गई कि उनका परिवार इस बात पर अड़ गया कि जब तक उनकी मांगें पूरी नहीं होती तब तक वो मृतक का अंतिम संस्कार नहीं करेंगे।
काशीपुर पहुंचने के बदले देहरादून में गलत मुद्दे पर किया प्रदर्शन
अब ये वो मौका था जब विपक्ष को सीधा काशीपुर पहुंचना चाहिए था। किसान के परिवार के साथ खड़ा होना चाहिए था। लेकिन उस वक्त हमारी मुख्य विपक्षी पार्टी कांग्रेस देहरादून में मंत्री रेखा आर्या के पति गिरधारी लाल साहू के अल्मोड़ा में दिए बयान पर हंगामा काट रही थी। जिसमें गिरधारी लाल साहू ने बिहार की महिलाओं पर आपत्तिजनक टिप्पणी की थी।
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इसमें कोई शक नहीं कि गिरधारी लाल का वो बयान गलत था। लेकिन सवाल यह है कि कांग्रेस पार्टी को गिरधारी लाल की याद उसी दिन क्यों आई, जिस दिन किसान का परिवार काशीपुर में सड़कों पर था? सवाल यह है कि जब यह टिप्पणी की गई थी, तो कांग्रेस पार्टी ने यह मुद्दा क्यों नहीं उठाया? और आज, इतने दिनों बाद जब काशीपुर जाने का समय आया जब सरकार पर दबाव डालने का समय आया, तभी कांग्रेस पार्टी ने इस मुद्दे पर हंगामा करना शुरू कर दिया।
सही मुद्दे नहीं पकड़ रही कांग्रेस
अब सवाल उठ रहे हैं कि क्या यह कांग्रेस पार्टी की सोची-समझी रणनीति का हिस्सा था? क्योंकि कांग्रेस को अच्छी तरह पता था कि काशीपुर में उनका विरोध प्रदर्शन सत्ताधारी पार्टी के हालात को सुलझाने की कोशिशों में रुकावट डालेगा और ठीक यहीं पर कांग्रेस ने सरकार के लिए कार्रवाई करने का रास्ता साफ कर दिया। और अब जब मृतक किसान का परिवार प्रशासन की कार्रवाई से संतुष्ट है और किसान सुखवंत सिंह का अंतिम संस्कार हो चुका है, तो कांग्रेस नेता वहां पहुंच रहे हैं। आप इसे क्या कहेंगे?
जानें कब-कब विपक्ष ने निभाई मित्र की भूमिका
बता दें यह पहली बार नहीं हुआ है। इससे पहले, UKSSSC पेपर लीक मामले ने पूरे राज्य में हंगामा मचा हुआ था। सरकार द्वारा परीक्षा रद्द करने के बाद ही विपक्ष जागा और विरोध मार्च निकाला। उदाहरण के लिए, अंकिता भंडारी हत्याकांड को ही ले लीजिए। कथित VIP का नाम सामने आने के बाद कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष गणेश गोदियाल ने क्या किया? उन्होंने दिल्ली में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस की और सरकार को कार्रवाई करने के लिए 10 दिन का समय दिया। सरकार ने इसका फायदा उठाया। मुख्यमंत्री धामी ने चालाकी दिखाते हुए CBI जांच की घोषणा कर दी, और मामला शांत हो गया।
गणेश गोदियाल के प्रदेश अध्यक्ष बनने के बाद भी नहीं बदले हालात
सोचने वाली बात है, यह विपक्ष है या सरकार का सपोर्ट सिस्टम? इसे ED का डर कहिए या शायद खनन और ठेकेदारों के साथ अच्छे रिश्ते, क्योंकि जिस तरह से कांग्रेस पार्टी ज़रूरी मुद्दों पर पीछे हट जाती है, उससे यह पक्का होता है कि शायद नेता सरकार के खिलाफ आवाज़ उठाने से ज़्यादा अपने बिज़नेस और मन की शांति को अहमियत देते हैं। एक समय था जब BJP विपक्ष में थी। अगर गैस सिलेंडर की कीमत एक रुपया भी बढ़ जाती थी, तो सड़कें जाम हो जाती थीं और सरकार हिल जाती थी। विपक्ष का काम ही यही होता है सरकार पर सवाल उठाना, दबाव बनाना। लेकिन उत्तराखंड में कांग्रेस विपक्ष से मित्रता निभा रहा है। कुल मिलाकर आज राज्य में कांग्रेस बस एक ड्रामेबाज विपक्ष से ज्यादा कुछ नहीं है। जिसमें गणेश गोदियाल के आने के बाद भी कुछ खास असर पड़ता दिखाई नहीं दे रहा है।