

भारतीय रिजर्व बैंक की तमाम कोशिशों के बावजूद डॉलर के मुकाबले रुपया (Rupee vs Dollor) का गिरना जारी है। गुरुवार को रुपया अपने रिकॉर्ड निचले स्तर पर पहुंच गया है। गुरुवार को एक डॉलर के मुकाबले रुपए की कीमत 79.74 पर गिर गई।
देश के इतिहास में पहली बार रुपया लगातार डॉलर के मुकाबले गिरता ही जा रहा है। सरकार रुपए की गिरती कीमत को रोकने में नाकाम है और आरबीआई की कोई कोशिश काम नहीं आ रह है।
गुरुवार को फॉरेक्स मार्केट में डॉलर के मुकाबले भारतीय मुद्रा 79.74 रुपये तक चली गई, जो अब तक का रिकॉर्ड निचला स्तर है।
डॉलर के मुकाबले रुपए के गिरने की कई वजहें बताईं जा रहीं हैं। माना जा रहा है कि अमेरिका में महंगाई के चलते और ग्लोबल मार्केट में चल रहे उतार चढ़ाव के चलते डॉलर की मांग बढ़ती जा रही है। यूक्रेन और रूस के बीच चल रहे युद्ध के चलते रूस बड़े पैमाने पर प्रतिबंध का सामना कर रहा है। ऐसे में ट्रेडिंग के लिए डॉलर की मांग बढ़ रही है। लगातार बढ़ती मांग के चलते डॉलर 20 साल के सबसे मजबूत स्थिति में पहुंच चुका है। डॉलर के मजबूत होने के सीधा असर भारत के रुपए पर दिख रहा है।
रुपए की कीमत गिरने से भारत के लिए आयात महंगा हो जाएगा। दरअसल आयातकों को डॉलर के मुकाबले अधिक रुपया खर्च करना पड़ रहा है। इससे आयात होने वाली वस्तुएं महंगी होना स्वाभाविक हैं।
रुपया गिरने से क्या होगा असर
भारत चूंकि अपनी कुल खपत का 85 फीसदी कच्चा तेल आयात करता है ऐसे में डॉलर महंगा होने और भारतीय अर्थव्यवस्था पर दबाव बढ़ना स्वाभाविक है। इससे कंपनियां तेल का दाम बढ़ाएंगी।
ईंधन महंगा हुआ तो माल ढुलाई की लागत बढ़ जाएगी जिससे रोजमर्रा की वस्तुओं के दाम बढ़ेंगे और आम आदमी पर महंगाई का बोझ भी और बढ़ना तय है।
विदेशों में पढ़ाई करने वालों पर भी इसका असर पड़ेगा और उनका खर्च बढ़ जाएगा, क्योंकि अब डॉलर के मुकाबले उन्हें ज्यादा रुपये खर्च करने पड़ेंगे।
चालू खाते का घाटा बढ़ जाएगा जो पहले ही 40 अरब डॉलर पहुंच गया है। पिछले साल समान अवधि में यह 55 अरब डॉलर सरप्लस था।
भारतीय कंपनियों ने विदेशी बाजारों से बड़ी मात्रा में कर्ज ले रखा है। एक अनुमान के मुताबिक, भारतीय कॉरपोरेट जगत पर दिसंबर 2021 तक करीब 226.4 अरब डॉलर का विदेशी कर्ज था। डॉलर के मुकाबले रुपया ऐसे ही गिरता रहा तो इस कर्ज का ब्याज चुकाने में कंपनियों को काफी मुश्किल आएगी क्योंकि रुपये की कमजोरी से उनकी ब्याज अदायगी की राशि लगातार बढ़ती जाएगी।
हालांकि, विदेशी बाजारों से भारत में रुपया भेजने वालों को कमजोर भारतीय मुद्रा से लाभ होगा और उन्हें देश में इसकी ज्यादा कीमत मिलेगी।