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धामी ने बदला गोलपोस्ट, रणनीति बदलने को मजबूर विपक्ष

Breaking uttarakhand newsउत्तराखंड में पांच साल में तीसरे मुख्यमंत्री बने पुष्कर सिंह धामी ने यकीनी तौर पर विपक्षी पार्टियों को गोलपोस्ट बदल दिया है। अब तक जो विपक्षी दल त्रिवेंद्र और तीरथ को लेकर रणनीति बनाकर मुतमइन थे कि अब अगले चुनावों में कड़ी टक्कर दे पाएंगे उनके लिए धामी का सौम्य व्यवहार और सख्त शासन का मौजूदा ‘कॉम्बिनेशन’ नई चुनौती के तौर पर देखा जा सकता है। 4 जुलाई को सीएम पद की शपथ लेने के बाद धामी का ‘ओपनिंग शॉट’ ही ऐसा था कि विपक्ष की फिल्डिंग मुश्किल में जरूर होगी।

निशाना कहीं, असर कहीं

पुष्कर सिंह धामी को हालांकि मौजूदा वक्त तक ये कहना जल्दबाजी हो सकती है कि वो एक मंझे हुए राजनीतिक बन गए हैं लेकिन इस बात में दो राय नहीं है कि वो खांटी राजनीतिक अंदाज में आगे बढ़ रहें हैं। इस बात को समझने के लिए आपको धामी कैबिनेट के तीन चेहरों को पढ़ना होगा। पहले हैं हरक सिंह रावत, दूसरे सतपाल महाराज और तीसरे हैं यशपाल आर्य।

यूं तो कैबिनेट में धामी ही दूसरे सबसे युवा हैं। सिर्फ रेखा आर्या ही उम्र में उनसे छोटी हैं लेकिन बावजूद इसके धामी ने सबको साध लिया है। शुरुआती दौर में ‘कोपभवन’ वाले विलाप के बाद अब सभी ‘बुजुर्ग’ मंत्री धामी की कप्तानी स्वीकार कर अगले विधानसभा का फाइनल अभी से जीतने की खुशी में चीयर कर रहें हैं। न जाने धामी ने इन्हे क्या घुट्टी पिलाई लेकिन अगर हरक सिंह रावत भी चुप बैठे हों तो समझिए कि कुछ तो हुआ है।

विवाद से बचते, कांटों पर चलते

पुष्कर धामी को पता है कि उनकी राह कांटों भरी है। त्रिवेंद्र और तीरथ के कार्यकाल में जो भी काम हुए उनपर भारी उनके हटने का घटनाक्रम रहा है। ऐसे में धामी की ताजपोशी का घटनाक्रम भी उनके लिए उनकी राह के कांटों को और बढ़ा ही रहा है। फिर ऐसे में धामी बड़ी सफाई से विवादित मसलों वाली बाउंसर गेंदों को छोड़ दे रहें हैं। फिर देवस्थानम बोर्ड का मसला हो या फिर भू कानून का मसला। धामी चुपचाप माहौल को देख रहें हैं। त्रिवेंद्र और तीरथ की तरह अब तक धामी का कोई विवादित बयान भी फिलहाल नहीं आया है। सोशल मीडिया में भी उनकी छवि को लेकर व्यक्तिगत तौर पर कुछ खास आक्षेप नहीं हैं बजाए इसके कि उनका एक पुराना चुनावी सभा का वीडियो।

धामी के लिए एक और अच्छी बात और है कि उनकी सरकार के पास समय कम है। उन्हे पता है कि उनका टारगेट क्या है। स्लाग ओवरों में छक्के ही मारने हैं और बैकफुट पर जाने की जरूरत ही नहीं है।

बदलनी होगी रणनीति

विपक्षी पार्टियों के लिए धामी एक ऐसे चैलेंज के तौर पर हैं जिनके बारे में फिलहाल कोई तैयारी नहीं थी। विपक्षी पार्टियों के पास धामी को लेकर हथियार मौजूद नहीं हैं। कांग्रेस के हालिया हालात को ही लीजिए। उत्तराखंड में कांग्रेस अपने नेता विपक्ष की तलाश में लगी है और चार हफ्तों से अधिक वक्त बीत जाने के बावजूद उसे अपने लिया नया नेता नहीं मिल पा रहा है। अनुमान लगाया जा रहा है कि धामी के चलते अब कांग्रेस नए सिरे से रणनीति बनानी पड़ रही है। धामी अगर बच बचाकर चलते रहे तो विपक्ष के लिए मुश्किल होनी है। ऐसे में विपक्ष को धामी को घेरने के लिए नई रणनीति बनानी होगी।

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