
देहरादून: भले ही कोरोना से उत्पन्न स्थितियों से निबटने के लिए केंद्र सरकार ने सांसद निधि जारी करने पर अगले दो सालों के लिए रोक लगा दी हो लेकिन उत्तराखंड में विधायकों की निधि पर कैंची चलना जरा मुश्किल लग रहा है। ऐसा लग रहा है मानों सरकार अपने विधायकों की नाराजगी नहीं मोल लेना चाहती है।
माननीयों की नजर, निधि पर न हो असर
सांसदों को मिलने वाले फंड की कटौती को सैद्धांतिक रूप के प्रदेश के मुखिया भी सही मानते हैं। शुरुआती बयानों से लगा कि सूबे में भी विधायकों को हर साल मिलने वाली धनराशि बंद की जाएगी। माना जा रहा था कि कैबिनेट की बैठक में इसका फैसला लिया जा सकता है।
लेकिन सभी अनुमान कैबिनेट की बैठक के बाद गलत साबित हुए। सरकार सिर्फ विधायकों के वेतन में तीस फीसदी की कटौती का ही फैसला ले पाई। विधायक निधि को दो सालों के लिए सस्पेंड करने का फैसला नहीं लिया जा सका। हां, इतना जरूर है कि हर विधायक की निधि में से 1 करोड़ रुपए दो सालों के लिए काटे जाएंगे।
अब सरकार के इस ‘मुंह दिखाई वाली’ कटौती पर सवाल खड़े हो रहे हैं। माना जा रहा है कि त्रिवेंद्र सरकार को ‘अपनों’ के रुठने का डर है और लिहाजा जरा हाथ हल्का करना पड़ा।
पहला सवाल : क्या सरकार को है अपनों के रुठने का डर
सवाल उठ रहे हैं कि कोरोना से लड़ने के लिए जहां केंद्र सरकार ने सांसदों की 2 साल तक के लिए सांसद निधि पर रोक लगा दी तो राज्य सरकार ने विधायकों की विधायक निधि से केवल 1-1 करोड़ ही क्यों दो साल तक के लिए रोकी। क्या सरकार को अपने के रुठने का डर सता रहा था?
दूसरा सवाल : क्या 2022 की तैयारी को देखते हुए सरकार ने हल्का रखा कदम
त्रिवेंद्र सरकार के विधायक निधि पर फैसला लेने के बाद ये भी कहा जा रहा है कि विधानसभा चुनाव पास आने को है।सरकार जीत हासिल करने के लिए अभी से तैयारियों में जुट गई है जिसके लिए विधायकों को विधायक निधि की खासा जरुरत होती है और इसी से पार्टी को जिताने के लिए और लोग भी काम करते हैं। कोरोना से लड़ने के लिए जहां कई लोग आगे आए और सहयोग के लिए तैयार है ऐसे में त्रिवेंद्र सरकार ने हल्का कदम क्यों रखा ये भी सवाल किया जा रहा है।वहीं खबर ये भी उड़ रही है कि त्रिवेंद्र सिंह रावत पूरी विधायक निधि को सस्पेंड करना चाहते थे, लेकिन उनके करीबी इस पक्ष में नहीं थे।
हर साल विधायकों को मिलती है करीब चार करोड़ की विधायक निधि
जानकारी के लिए आपको बता दें कि विधायकों को हर साल करीब चार करोड़ की विधायक निधि मिलती है। इसी विधायक निधि से विधायक छोटे-छोटे काम करवाते हैं। वहीं चुनाव भी पास आने को है ऐसे में अगर विधायकों की निधि को ज्यादा काट दिया जाता या रोक दिया जाता तो इसका असर चुनाव पर पड़ता। क्योंकि विधायकों के कुछ ऐसे ठेकेदार होते हैं जो की चुनावों में मंत्री-विधायकों के लिए काम करते हैं औऱ उनको छोटे-छोटे काम नहीं देने से उनका चुनावी मैनेजमेंट भी गड़बड़ा सकती है। जानकारों की मानें तो इसी कारण सरकार ने पूरी विधायक निधि सस्पेंड नहीं की।
बड़ा सवाल?
सवाल यह है कि अगर देशभर के सांसदों की सांसद निधि दो साल के लिए सस्पेंड हो सकती है तो फिर विधायकों की निधि को सस्पेंड करने से उत्तराखंड सरकार को किसने रोका ?