जहां कैप्टन बत्रा ने लहराया था तिरंगा वहां पहुंचा भाई, फोन कर कहा-मैं वहां पहुंच गया हूं पापा

7 जुलाई 1999 का दिन भला कोई कैसे भूल सकता है. औऱ वो मां-पिता औऱ भाई भी इस दिन को नहीं भूल सकता जिस दिन उनका सैनिक भाई दुश्मनों से लोहा लेते हुए शहीद हुआ था. जी हां परमवीर चक्र विजेता कैप्टन विक्रम बत्रा ने अदम्य साहस का परिचय देते हुए करगिल की पॉइंट 4875 से दुश्मनों को खदेड़कर तिरंगा लहराया था। युद्ध जीतने के बाद भारत सरकार ने इस चोटी का नाम बत्रा टॉप रख दिया था।

शहादत दिवस पर भाई पहुंचा टॉप पर

वहीं बीते दिन रविवार को ठीक कैप्टन बत्रा के शहादत दिवस पर जब उनके भाई विशाल बत्रा इस टॉप पर पहुंचे तो उनकी आंखें नम हो आईं। उन्होंने सबसे पहले अपने माता-पिता को फोन किया और भावुक होते हुए कहा मैं वहां पहुंच गया हूं पापा…विशाल यह भी कहना चाहते थे कि यह फोन करते हुए यहां विक्रम को भी होना चाहिए था।

विशाल को लंबे समय से इंतजार था जो की रविवार को पूरा हुआ

आपको बता दें कि विशाल बत्रा युद्ध के दौरान करिगल और द्रास सेक्टर में करीब 15 बार गए। इस दौरान हर बार उनकी चाह रही कि उन्हें अपने भाई की याद में बने बत्रा टॉप (4875) पर जाने का मौका मिले लेकिन हर बार वह इससे चूक गए। विशाल को लंबे समय से इंतजार था जो की रविवार को पूरा हुआ। कैप्टन बत्रा के शहीदी दिवस पर रविवार को 14 कोर के कमांडर लेफ्टिनेंट जनरल वीके जोशी, 13 जम्मू ऐंड कश्मीर राइफल्स, अन्य सैन्य अधिकारी और अपनी यूनिट के कमांडिंग अफसर के साथ विशाल को अपने भाई के शहादत स्थल पर तिरंगा लहराने का मौका मिला।

विक्रम बत्रा हमेशा कहते थे, ये दिल मांगे मोर

लेफ्टिनेंट जनरल वीके जोशी ने कहा कि विशाल इसलिए भावुक हैं क्योंकि यह बात उसके भाई विक्रम ने युद्ध के दौरान कही थी। जोशी याद करते बताते हैं कि जब मैंने उससे पाकिस्तानी सैनिकों द्वारा कब्जे में लिए गए एक और चोटी 5140 को फतह करने का निर्देश दिया और पूछा कि रेडियो पर उसका इसके लिए गुप्त संदेश क्या होगा, तब विक्रम ने कहा था, ‘ये दिल मांगे मोर…हालांकि मैंने इसे मजाक में लिया था और उससे पूछा भी कि क्यों यही शब्द, तो विक्रम ने कहा था, क्योंकि मैं सिर्फ एक नहीं बल्कि अधिक से अधिक पाकिस्तानी बंकरों पर कब्जा करना चाहता हूं। मुझे अब भी याद है कि जब भी वह सफल होता था, हर बार यह दोहराता था…ये दिल मांगे मोर..

‘मेरा विश्वास है कि सैनिक कभी मरते नहीं’

5140 पर जीत के बाद 4875 को कब्जे में लेने का निर्देश दिया गया था। हालांकि कैप्टन बत्रा बीमार पड़ गए थे पर उन्होंने हार नहीं मानी। बाद में यहां दुश्मनों से लड़ते हुए वह शहीद भी हो गए। विशाल कहते हैं कि जहां मेरा भाई शहीद हुआ, वह जगह मेरे लिए किसी तीर्थस्थल की तरह है। वह शारीरिक रूप से भले ही यहां मौजूद ना हो लेकिन मुझे पूरा विश्वास है कि वह यहीं कहीं पहाड़ों में रहकर हम सबकी सुरक्षा कर रहा है। मेरा विश्वास है कि सैनिक कभी मरते नहीं हैं।

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