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मेनका के ‘लेटर बम’ से उत्तराखंड की राजनीति में खलबली, लिखा-आपके अधिकारी खनन माफिया से मिले हैं

Chief Minister Tirath Singh Rawat

देहरादून : मेनका गांधी के लेटर बम से उत्तराखंड के सियासी गलियारों में हड़कंप मच गया है। एक के बाद एक कर ऐसे मामले सामने आ रहे हैं जिससे सरकार का असहज होना लाजमी है। वहीं दूसरी ओर अधिकारियों की मंत्री-विधायकों से तनातनी भी किसी से छुपी नहीं है जिस पर कांग्रेस और विपक्ष लपके और सरकार को जमकर कोसा। वहीं एक बार फिर विपक्ष को बैठे बिठाए सरकार को कोसने और विरोध करने का मौका मिल गया है।

मेनका गांधी की चिट्ठी से प्रदेशभर में खलबली

जी बां बता दें कि बता दें कि सांसद मेनका गांधी के त्रिवेंद्र रावत सरकार के दौरान वन विभाग के एक अधिकारी पर खनन कारोबार को बढ़ावा दिए जाने के कथित आरोप की चिट्ठी से प्रदेशभर की राजनीति में खलबली मच गई है। सांसद मेनका गांधी ने मौजूदा तीरथ सिंह रावत  सरकार को एक लेटर लिखा है जिससे एक बार फिरसे सरकार में असहज की स्थिति पैदा कर दी है। पहले कुंभ घोटाला, फिर पुस्कालय घोटाला और अब खनन माफिया का खेल…इन मामलों को लेकर सरकार असहज हो गई है। सरकार की जमकर किरकिरी हो रही है।

लेकिन आज तक कोई जवाब नहीं मिला-मेनका गांधी

बता दें कि मेनका गांधी ने खनन माफिया को बढ़ावा दिए का आरोप लगाते हुए इस लेटर से न केवल सरकार को कटघरे में खड़ा कर दिया है, बल्कि विधानसभा चुनाव से कुछ महीने पहले ही विपक्ष को एक खासमखास सरकार को घेरने का मुुद्दा दे दिया है। बता दें कि मेनका गांधी ने सीएम को लिखे लेटर में कहा कि पूर्व में भी उन्होंने कम्युनिटी रिजर्व के संबंध में रिपोर्ट मांगी थी। लेकिन आज तक कोई जवाब नहीं मिला।

लिखा कि प्रमुख सचिव वन एवं पर्यावरण के शासनादेश से जिन स्थानों पर प्रवासी पक्षियों के लिए कम्युनिटी रिजर्व बनाना तय किया गया है। उनका मुख्य उद्देश्य केवल खनन किया जाना है। जिसमें आपके अधिकारी भी खनन माफियाओं से मिले हैं। सांसद मेनका गांधी ने कहा कि प्रवासी पक्षी किसी भी तालाब को खोदकर नहीं लाए जा सकते हैं। उन्होंने कहा कि अधिकारियों की ओर से क्या कोई सर्वे किया गया है कि यहां कौन-कौन सी बर्ड्स आती हैं। कहां से आती हैं और उत्तराखंड में कहां-कहां पाई जाती हैं।उन्होंने पत्र में कहा कि कम्युनिटी रिजर्व बनाने के लिए अन्य कौन से स्थान चुने गए हैं। इससे उन्हें अवगत कराया जाए। जबकि प्रमुख सचिव वन के सात अगस्त 2020 के शासनादेश को निरस्त किया जाए।

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