उत्तराखंड: हरक और हरक की नाराजगी, कोई नई बात नहीं

देहरादून : 2022 का सियासी समर शुरू होने जा रहा है। चुनावी संग्राम की तैयारियां जोरों पर हैं। किसी भी वक्त तारीखों को ऐलान हो सकता है। उससे पहले ही भाजपा और कांग्रेस, जो चुनावी संग्राम में आमने-सामने होंगे। दोनों के बीच ही मुख्य मुकाबला होने वाला है। लेकिन, ऐन चुनाव से पहले दोनों ही दलों में रूठने-मनाने का खेल चल रहा है। कांग्रेस में हरीश रावत ने ट्वीट से सियासी भूचाल ला दिया। शुक्रवार देर शाम को हरक ने कैबिनेट बैठक में ही इस्तीफे का ऐलान कर दिया, जिसके बाद भाजपा में सियासी भूंचाल आया हुआ है।

एनडी तिवारी सरकार को लेकर हरक ने खुद खुलासा किया था कि वो सरकार को गिराने की तैयारी में थे। कांग्रेस में रहते हुए उनकी नाराजगी आए-दिन सामने आती रहती थी। पूर्व सीएम हरीश रावत से इस कदर नाराज हुए थे कि उन्होंने सरकार को ही संकट में डाल दिया था। राज्य में राष्ट्रपति शासन तक लगाना पड़ा। हालांकि बाद में हरीश रावत सीएम के तौर पर फिर बहाल हो गए थे।

हरक सिंह रावत इसी सरकार में त्रिवेंद्र सिंह रावत से भी नाराज हो गए थे। उनकी नाराजगी इस कदर बढ़ी कि त्रिवेंद्र ने सीएम रहते उनको श्रम कर्मकार कल्याण बोर्ड से ही चलता कर दिया था। हरक की चहेती सचिव को भी हटा दिया गया था। कर्मचारियों को भी हटाया गया। त्रिवेंद्र की कुर्सी जाने के बाद हरक ने फिर से अपने मनमुताबिक काम किया।

इसी साल जुलाई में सरकार में नेतृत्व परिवर्तन के समय भी हरक सिंह रावत रुठ गए थे। उनकी नाराजगी काम आई और उनको ऊर्जा जैसे बड़ा मंत्रालय मिल गया। इस बार हरक की नाराजगी मेडिकल कॉलेज नहीं बनने की थी। हरक जब भी नाराज होते हैं, उनको कुछ ना कुछ लाभ जरूर मिलता है।

कैबिनेट ने उनके प्रस्ताव पर मेडिकल कॉलज के लिए पांच करोड़ रुपये का प्रावधान तो कर दिया, लेकिन गेंद अब केंद्र के पाले है। हरक के मेडिकल कॉलेज के सपने का पूरा होना इतना आसान नहीं है। उसके लिए सरकार को नियमों में बदलाव करना होगा। बड़ा सवाल यह है कि चुनाव से ठीक पहले सरकार यह कैसे करेगी। इसमें केंद्र सरकार की भी भूमिका है।

हरक केवल रूठेते ही नहीं। कसमें भी खाते हैं। रहक ने एक बाद धारी देवी में जाकर यह कसम खार्द थी कि वो कभी मंत्री नहीं बनेंगे, लेकिन हुआ क्या, हरक फिर से मंत्री बने और अपना कार्यकाल भी पूरा किया। इसी सरकार के कार्यकाल में हरक ने यह भी कहा था कि वो कभी चुनाव नहीं लड़ेंगे, लेकिन फिर कुछ ही दिन बाद बयान को दूसरे तरीके ये भी जाहिर कर दिया था कि उन्होंने ऐसा नहीं कहा था।

कुल मिलाकर देखा जाए तो हरक सिंह रावत को भरोसा कम है। कब रूठते हैं और कब मान जाएंगे। ये केवल वही जानते हैं। उनके रूठने की टाइमिंग और फिर मान जाने की टाइमिंग भी खास होती है। एक बात तो साफ है कि इस सरकार में हरक सिंह रावत की हनक कुछ खास नहीं चली।

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