सारे अनुमान ध्वस्त : 40 सालों में सबसे बुरे दौर में अर्थव्यवस्था, घनघोर मंदी की ओर भारत…पढ़िए खास रिपोर्ट

बीते दिन सोमवार को भारत सरकार के राष्ट्रीय सांख्यिकी विभाग ने वर्ष 2020 की पहली तिमाही की जीडीपी (सकल घरेलू उत्पाद) का डाटा जारी कर दिया है। जीडीपी के गिरने का इतना भयानक रूप शायद किसी ने सोचा भी नहीं होगा। जी हां राष्ट्रीय सांख्यकीय संस्थान की ओर से जारी जीडीपी की बात की जाए तो वो नेगेटिव अर्थात माईनस 23 प्रतिशत (-23%) है। बीते दिसम्बर में 7 प्रतिशत की दर से जीडीपी बढ़ने का दावा करने वाली वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण अब इसको भगवान का किया हुआ मान रही हैं। दरअसल जीडीपी में गिरावट का संकेत 2019 के जुलाई से ही मिलना शुरू हो गए थे। जब बड़े पैमाने पर बाजार में वस्तुओं की मांग कम होनी शुरू हो गयी थी और बड़ी बड़ी कंपनियां अपने प्रोडक्ट को बेचने में खुद को लाचार पा रही थी। मारुति से लेकर पूरा ऑटो उद्योग अपने जीवन काल के गंभीर संकट में था. उपभोक्ता उत्पादों से जुड़ी कंपनियां भी अपने प्रोडक्ट में 70 प्रतिशत तक गिरावट देख रही थीं।

शुतुरमुर्ग का रवैया

बीते साल 2019 में बार बार विपक्ष और अर्थशास्त्री जब सरकार से अर्थ व्यवस्था को लेकर सवाल पूछ रहे थे तो सरकार ने देश को समझाने के लिए मंत्रियों की एक लंबी चौड़ी फौज जिसमे रविशंकर प्रसाद ,पीयूष गोयल से लेकर तमाम मंत्री और खुद वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण बार बार टीवी पर आकर सब चंगा सी (सब अच्छा है) का नारा बुलंद कर रहे थे। प्रधानमंत्री मोदी तो अमेरिका में जाकर दहाड़ रहे थे कि सब चंगा सी। दरअसल उस समय पूरी सरकार ने जनता में खुद की इज्जत बचाने के लिए शुतुरमुर्ग का रवैया अख्तियार करते हुए अर्थव्यवस्था को जूझने के लिए छोड़ दिया। उस समय सवाल पूछने वालों पर हंसा गया। उनका मजका बनाया गया लेकिन हकीकत से नजरें चुराई गईं. ये अब स्पष्ट है कि जब देश की अर्थव्यवस्था घाटे की अर्थव्यवस्था के रूप में -23% की जीडीपी की तस्वीर सामने आई है।

बेरोजगारी और छँटनी भी बड़ा कारण

अगर आंकड़ों पर नजर डाली जाए तो वित्तीय वर्ष 2019 की दूसरी तिमाही से तीसरी तिमाही तक ही तकरीबन 19 लाख लोग अपनी अच्छी खासी नौकरियां गवां चुके थे। लेकिन सरकार की आंखें तब भी मंदी की आहट सुन नही पा रही थी। ग्रामीण क्षेत्रों से लेकर शहरी क्षेत्रों तक में उपभोक्ता की मांग एकदम गिरी हुई थी। मगर सरकार उसको मानने को तैयार नहीं थी। कम्पनियां घाटे में चल पड़ीं थीं और कर्मचारियों को बाहर निकाल कर खर्च घटाने का काम कर रहीं थी। तब भी निर्मला सीतारमण 7 प्रतिशत ग्रोथ की रट लगाकर सब चंगा सी का नारा बुलंद किये हुए थीं। देश दुनिया के बड़े-बड़े अर्थशास्त्रियों की बात को दरकिनार कर ‘सब चंगा सी’ की अर्थव्यवस्था का नारा बुलंद किया जा चुका था जिसका परिणाम अब सामने आया है।

50 लाख रोजगार हुए खत्म

हालांकि ये मानने में गुरेज़ नहीं है कि कोरोना लॉकडाउन के चलते मंदी और बढ़ी है और जीडीपी पर इसका असर आया है। मगर वित्त विशेषज्ञों की मानी जाए तो भी इतनी बड़ी गिरावट की आशंका किसी को भी नहीं थी। सीएमआई कि रिपोर्ट के अनुसार पहली तिमाही से दूसरी तिमाही के बीच लगभग 50 लाख रोजगार खत्म हुए हैं यानी 70 सालों में सबसे बड़ी बेरोजगारी को भी देश झेल रहा है।

बंदरगाह, एयरपोर्ट से लेकर तमाम चीजें जो बिक सकती हों बेंच दी जाएं…

ताजा आंकड़ों को देख कर ये साफ है जैसा कि रिज़र्व बैंक के गवर्नर शशिकांत दास कहते हैं कि मंदी आएगी और वो इस से निपटने के लिए सरकारी संपत्तियों को बेचने की सलाह भी दे रहे हैं कि बंदरगाह, एयरपोर्ट से लेकर तमाम चीजें जो बिक सकती हों बेंच दी जाएं। ये साफ इशारा है कि आने वाले समय में भारत 40 सालों की सबसे बड़ी मंदी की ओर जाने वाला है जहां बेरोजगारी बढ़ेगी ,छोटे कारखाने दिवालिया होंगे और बड़े बड़े कारखाने आंसू रो देंगे । मगर सरकार का क्या है, राम मंदिर का भव्य निर्माण होकर इन मुद्दों से इतर सरकार बोलेगी, सब चंगा सी।

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