हवा में उड़ी उत्तराखंड की एयर एम्बुलेंस सेवा, 2 लाख में हेलीकॉप्टर बुक करके बेटे को ले गए अस्पताल

चमोली : एक बार फिर से सरकार और स्वास्थय विभाग के दावे ध्वस्त होते दिखे। इस बात में कोई दो राय नहीं है कि पहाड़ के अस्पताल मात्र रेफर सेंटर बनकर रह गए हैं जिस चक्कर में कइय़ों की सांसे में थम गई और उनकी मौत हो गई। धूमाकोट बस हादसा औऱ आराकोट आपदा में सबक लेते हुए सरकार द्वारा एयर एम्बुलेंस और एय़रलिफ्ट के दावे किए गए लेकिन ये दावे हवा में उड़ गए। पहाड़ों में डॉक्टर जाना नहीं चाहते और पोस्टिंग होती भी है तो डॉ़क्टर गायब रहते हैं औऱ पहाड़ी क्षेत्रों के सरकारी अस्पतालों की हालत भी बदतर हैं। सरकार चाहे लाख दावे कर ले लेकिन इन दावों को पोल खुलती देखनी हो तो पहाड़ मं जाकर देखें।

सुधार औऱ दावे दोनों ही हुए ध्वस्थ 

सरकार के दावों की धज्जियां खुद जन प्रतिनिधि औऱ स्वास्थय विभाग के अधिकारी उड़ाते नजर आ रहे हैं। जी हां बीते दिन चमोली जिले की ये घटना के बारे में जानकर आपको जरुर सीएम की उस घोषणा और एयरलिफ्ट सेवा की याद आएगी जिसमे खासतौर पर दुर्गम क्षेत्रों में घायलों और बिमार लोगों को एयरलिफ्ट एम्बुलेंस के जरिए अस्पताल पहुंचाने का दावा किया गया था और इनता ही नहीं 26 जनवरी 2019 को सीएम ने एयरलिफ्टस सेवा की शुरुआत भी की थी. सीएम ने कहा था कि प्रदेश के दूरस्थ क्षेत्रों में स्वास्थ्य सुविधा सुचारू करने के लिए 26 जनवरी से प्रदेश में एयर एंबुलेंस का संचालन शुरू किया. इससे दूरस्थ क्षेत्रों की स्वास्थ्य सुविधाओं में सुधार आएगा. लेकिन वो सुधार औऱ दावे ही ध्वस्थ हो गए।

उत्तराखंड के अस्पताल बने रेफिरंग सेंटर

लेकिन ये सरकार के इस दावे की बीते दिन चमोली में धज्जियां उड़ती दिखी और इतना ही नहीं ये भी दिखा की उत्तराखंड की जनता और यहां की स्वास्थ्य सेवाएं कितनी लाचार है। पहाड़ों में स्वास्थय सेवाएं बदहाल है और अस्पताल खुद बिमार हैं जो की रेफरिंग सेंटर बनकर रह गए हैं।

तमाम जनप्रतिनिधियों ने किए हाथ खड़े

जी हां बीते दिन चमोली जिले के घाट ब्लॉक में 26 वर्षीय प्रदीप निवासी घाट उसतोली बीते दिन सीढ़ियों से गिरकर घायल हो गए थे। जिसके बाद परिजन घायल को गोपेश्वर अस्पताल ले गए लेकिन घायल की गंभीर हालत को देखते हुए डॉक्टर ने उसे हायर सेंटर रेफर किया। रास्ता लंबा था और सड़कों की हालत भी खराब है ऐसे में घायल को जल्द से जल्द अस्पताल पहुंचाना था जिसको देखते हुए घायल के परिजनों ने शासन प्रशासन से हेलीकॉप्टर की मांग की लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ. तमाम जनप्रतिनिधियों ने जब हाथ खड़े कर दिए तो परिजनों को खुद दो लाख रुपये खर्च कर घायल को हेलीकॉप्टर से ऋषिकेश ले गए।

कब खत्म होगा रेफरिंग का खेल?

उत्तराखंड के दुर्गम इलाकों के अस्पतालों को देखकर तो यहीं कहा जा सकता है कि वहां के अस्पताल खुद बीमार है तो जनता का इलाज क्या करेंगे. अस्पताल है तो डॉक्टर नहीं डॉक्टर है तो ऐसी सुविधाएं नहीं की रेफर करने की जरुरत न पड़े. हर मामले में देखा जाता है कि मरीज की गंभीर हालत को देखते हुए रेफर किया जाता है लेकिन क्या सरकार के पास इसका कोई इलाज है कि ये रेफर-रेफर का खेल खत्म किया जा सके  औऱ उस एय़रलिफ्ट सेवा का लाभ लोगों को मिल सके.

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