मंत्रियों को अफसर दीजिये सीएम साहब

मंत्रियों के रूठने की खबर आने लगी हैं। अंदरूनी हालत पर गौर किया जाए तो कम से 5 मंत्री अपने ही मातहत अधिकारियों से असहज हैं, जहाँ अधिकारी अपने विभागीय मंत्री की बात न सुनकर सीधे मुख्यमंत्री कार्यालय से आदेश आने का हवाला देकर अपने मंत्री की कोई भी बात सुनने को तैयार नहीं हैं ऐसे में मंत्रियों का भी कहना सही प्रतीत होता है की अगर सरकार को हमसे और हमारे विभाग से नतीजे चाहिए तो कम से कम हमारे अधिकारी तो हमारे मनमाफिक हो जो हमारे आदेश को तवज्जो दें और विकास की सोच रखते हों।

कई विभागों में तो अधिकारियों ने मंत्री के आदेशों को जूते तले रौंदने की परंपरा शुरू कर दी है जिसको लेकर मंत्री असहज हैं और अंदर से नाराज भी, कहा जाता है की इन मंत्रियों ने मुख्यमंत्री से अपनी पीड़ा बयान भी कर दी है मगर मुख्यमंत्री अपनी व्यस्तताओं के चलते मंत्रियों की पीड़ा का मर्म नहीं समझ पा रहे हैं जिसका खामियाजा मंत्रियों की अंदरूनी नाराज़गी के रूप में अब दिखने लगा है , कैबिनेट मंत्री सतपाल महाराज तो हर आने जाने वाले से कहते थे कि मेरी पसंद का अधिकारी ही नहीं दे रहे हैं। इस तरह से हर व्यक्ति से कह कर अपनी नाराज़गी का इज़हार करने वाले सतपाल महाराज को उनकी पसंद का अधिकारी मिनाक्षी सुन्दरम के रूप में मिल गया मगर और मंत्री जिनके अधिकारी उनसे या तो उनसे सामंजस्य नहीं बैठा पा रहे हैं या फिर अपने मंत्री की अनदेखी करके मंत्री को अकड़ दिखने में लगे हैं। अगर ऐसे मंत्रियों की समस्या का समाधान नहीं हुआ तो अंदर ही अंदर एक गुस्से का उबाल आना लाज़मी है जिसको विरोधी खेमा हवा देने से चूकेगा नहीं और मुख्यमंत्री अपने सरल स्वाभाव की वजह से सियासत समझ नहीं पा रहे हैं

जिस तरह से कल आबकारी मंत्री प्रकाश पन्त के आला अधिकारियों ने खुद ही पॉलिसी बनाकर खुद ही मंत्री के खिलाफ मीडिया के एक धड़े को दावत दे देकर मंत्री और सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है उस लिहाज से तो किसी भी मंत्री का ऐसे माहौल में काम कर पाना नामुमकिन है जिसमे बदनामी अंततः सरकार की ही होनी है

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