हाईकोर्ट ने दिए उत्तराखंड सरकार को निर्देश, एसआईटी गठित करे सरकार

नैनीताल – हाई कोर्ट ने जहां निचली अदालत के आदेश को पलटा, वहीं मानव तस्करी पर सख्ती दिखाते हुए उत्तराखंड सरकार को भी आदेश दिया है।  नेपाल से शारदा बैराज बनबसा के रास्ते मानव तस्करी के मामले में दोषमुक्त अभियुक्त को दोषी करार दिया है। इस मामले में हाईकोर्ट 12  दिसंबर को दोषी को सजा सुनाएगी।

वहीं हाईकोर्ट ने राज्य सरकार से कहा है कि एसएसपी के निर्देशन में एसआइटी बनाकर इस मामले में जांच कर अभियुक्त के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज कराए। साथ ही मानव तस्करी रोकने के लिए दिशा-निर्देश जारी किए हैं।

हाईकोर्ट के वरिष्ठ न्यायाधीश न्यायमूर्ति राजीव शर्मा और न्यायमूर्ति आलोक सिंह की खंडपीठ के समक्ष सरकार की विशेष अपील पर सुनवाई हुई।

गौरतलब है कि पिछले साल नेपाल सीमा से सटे चम्पावत जिले के बनबसा में नेपाल के कोटेश्वर निवासी 17 वर्षीय रश्मि (काल्पनिक नाम) को सरफराज नामक युवक बेचने की नीयत से बहलाफुसला कर भारत ले आया। मुकदमा चलने पर शरफराज निचली कोर्ट से वह बरी हो गया

जिस पर राज्य सरकार ने निचली कोर्ट के फैसले के खिलाफ विशेष अपील दायर की गई। हाई कोर्ट ने अपील को स्वीकार करते हुए राज्य सरकार समेत सभी केंद्रीय एजेंसियों को मानव तस्करी रोकने के लिए कड़े दिशा-निर्देश जारी किए गए।

हाईकोर्ट ने अपने निर्देश मे कहा कि सुरक्षा में तैनात केंद्रीय ऐजेंसियां और राज्य की संस्थाएं नेपाल से आने वाले बच्चों, खासकर महिलाओं लड़कियों का सही सत्यापन करें और उनके बारे में नेपाल की संस्थाओं से भी जानकारी लें। इसके लिए नेपाल बार्डर से आ रहे बच्चों को सुरक्षा की सलाह देने के साथ उनके परिजनों के टेलीफोन नंबर और स्थायी पते की सही जानकारी ली जाए।

वहीं  उत्तराखंड पुलिस मानव तस्करों पर सख्त रवैया दिखाते हुए मनी लॉन्ड्रिंग एक्ट-2008 के तहत कार्रवाई करे और उस कार्रवाई में जमीन जायदाद को भी जोड़ा जाए।

मानव तस्करी पर अंकुश लगाने के लिए अंतरराष्ट्रीय बॉर्डर पर चौकसी बढ़ाई जाए और गैर सरकारी संगठन की मदद भी ली जाए। इसके अलावा पब्लिक अभियोक्ता व पुलिस अधिकारियों को पर्याप्त प्रशिक्षण के साथ ही मानव तस्करी पीडि़त को विधिक सहायता दी जाए।

सरकार डीएसपी स्तर के अधिकारी के नेतृत्व में मानव तस्करी के मामलों की जांच पड़ताल करने के लिए टीम बनाएं, जिसमें एक निरीक्षक, दो एसआइ, तीन एएसआइ, दस से 15 कांस्टेबल शामिल हों। टीम में 50 फीसद महिला अधिकारी शामिल हों।

 

 

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