सरकारी प्रबंधन का खामियाजा भुगत रहे हैं टिहरी जिले के कांगड़ा गांव के ग्रामीण

टिहरी (हर्षमणी उनियाल) –  टिहरी जिले के भिलंगना विकासखंड में एक गांव का नाम है कांगड़ा। सड़क से तकरीबन आठ-से दस किलोमीटर दूर ऊंची पहाड़ी में बसे इस गांव में कई दिक्कते हैं। देश को ब्रितानी हुकूमत से आजाद हुए पूरे 70 साल हो चुके हैं। जबकि राज्य बने पूरे 17 साल हो चुके हैं बावजूद इसके कांगड़ा गांव में बुनियादी सहूलियतों का अंधेरा है।
जिस दौर में सूबे की सरकार पलायन का रोना रो रही हो उस दौर में भी इस गाँव की आबादी १२०० से ज्यादा की बताई जा रही है। जिनमें 900 से ज्यादा मतदाता हैं। सड़क, बिजली, चिकित्सा जैसी बुनियादी सहूलियतों से महरूम कांगड़ा गांव के लिए अब आधार कार्ड बड़ी मुसीबत बन गया है।
khabaruttarakhand.com टीम ने कांगड़ा गांव का दौरा किया तो तब जाकर इस गांव के कष्ट बेपर्दा हुए। तकरीबन 8 किलोमीटर की खड़ी पहाड़ी चढ़ाई चढ़ने के बाद जब हमारी टीम ने गांव का मुआयना किया तो पता चला कि खूबसूरतवादियों में बसे गांव को सहूलियतों का अभाव पलायन की गहरी टीस देने वाला है। राज्य बनने के सत्रह साल बाद भी चुनी हुई सरकारें कांगड़ा जैसे गांव के सब्र का इम्तिहान लेने से नहीं हिचक रही हैं।
बुनियादी सहूलियतों से तरस रहे कांगड़ा गांव का दुरूह भूगोल गांव पर भारी पड़ ही रहा है। सरकारों की बेरुखी भी जले पर नमक छिड़कने का काम कर रही है। मौजूदा दौर में तो आधार कांगड़ा गांव के लिए ‘आधार’ एक बड़ी आफत बन  गया है।
“आधार” की बनियाद पर टिकी हिंदुस्तानी की पहचान ने इस गांव के वासिंदों की जिंदगी दोजख सी बना दी है। जिस टीम ने यहां के ग्रामीणों के आधार कार्ड  बनाए उन्होने तमाम ऐसी गल्तियां कर दी हैं जिनका खामियाजा कांगड़ा के ग्रामीण भुगत रहे हैं। आलम ये है कि आधार पर अंकित नाम बैंक खाते से मेल नहीं खा रहे हैं लिहाजा सरकार की नजरों में हकीकत बेमानी हैं।
ग्रामीणों की माने तो मनरेगा के कई काम करने के बावजूद उनके  बैंक खाते में पिछले २-३ साल से उनका मेहनताना नहीं आया। सिस्टम के काहिलपने से अनजान ग्रामीण इसका ठीकरा ग्राम प्रधान के सिर फोड़ रहे हैं। जबकि हकीकत इससे उलट है। जब हमारी टीम ग्रामीणों के आधार कार्ड और बैंक खातों का मिलान किया  तो पता चला की वहाँ के लोगों के आधार कार्ड पर अंकित नाम उनके बैंक खतों से बिलकुल भी मेल नहीं खा रहे थे।
ऐसे में सवाल उठता है कि, आखिर सरकारी योजनाओं के गलत प्रबंधन का खामियाजा ग्रामीण क्यों भुगतें! उससे भी बड़ा सवाल ये है कि क्या लोक कल्याण का दावा करने वाली सरकारें कभी सूबे के कांगड़ा जैसे गांवों की असलियत से वाकिफ हो पाएंगी या सभी का एक ही लाठी से हांका जाएगा।

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