सरकारी डॉक्टरों के आगे डीएम के आदेश भी बौने हुए साबित, खिलाड़ियों ने भुगता खामियाजा

देहरादून- सूबे में सरकारी डॉक्टरों के आगे दूसरे महकमें के सरकारी अधिकारियों की फरियाद भी गूंगी बन जाती है। जबकि जिलाधिकारी के आदेश हवा हवाई साबित होते हैं। ऐसे में आम जनता के साथ क्या सलूक होता होगा कहना मुश्किल है।

ये बात हम इसलिए कह रहे हैं कि खेल महाकुंभ की जिलास्तरीय वॉलीबॉल प्रतियोगिता में चोटिल महिला खिलाड़ियों को मौके पर जरूरी प्राथमिक चिकित्सा तक नहीं मिल पाई । जबकि खेल महाकुंभ आयोजन समिति के अध्यक्ष खुद जिलाधिकारी हैं और जिलाधिकारी ने खेल महाकुंभ में किसी भी प्रकार की कोताही न करने की ताकीद दी थी।

बावजूद इसके देहरादून के परेड ग्राउंड स्पोर्ट्स कांप्लेक्स में शुरू हुई जिलास्तरीय वॉलीबॉल प्रतियोगिता में खेलते वक्त घायल खिलाड़ी तड़पती रही लेकिन तैनात चिकित्सा महकमें की टीम नदारद दिखी। न कहीं तैनात डॉक्टर साहब मिले और न एंबुलेंस। फस्ट-एड के नाम पर एक मलहम मला गया। लिहाजा निजी गाड़ी से महिला खिलाड़ी को दून अस्पताल ले जाना पड़ा।

अंडर-17 बालिका वर्ग के फाइनल मुकाबले के दौरान डोईवाला की कीर्तिका ने शॉट लगाने के लिए जंप लिया। वापस जमीन पर पैर पड़ते ही कीर्तिका का संतुलन बिगड़ गया और उसका पैर फ्रैक्चर हो गया। कीर्तिका से जब उठा नहीं गया तो ऑफीशियल बैंच पर मौजूद पदाधिकारियों ने उसे मलहम लगाया। आयोजकों के पास अपनी फर्स्ट एड किट तो थी, लेकिन उससे बात नहीं बनी। आनन-फानन में निजी गाड़ी से कीर्तिका को उपचार के लिए दून अस्पताल लाया गया। अस्पताल में उपचार के बाद कीर्तिका को घर भेज दिया गया।

वहीं, ओपन महिला वर्ग के मुकाबले में रायपुर टीम की मुख्य खिलाड़ी पूजा के पैर में मोच आ गई। मौके पर पूजा को भी उपचार नहीं मिल सका। पूजा को बीच में ही मैच छोड़कर बाहर बैठना पड़ा।

वहीं जिला युवा कल्याण अधिकारी एसएस गुसाईं ने चिकित्सा महकमें की पोल खोलते बताया कि उन्होने सीएमओ से कई बार संपर्क किया लेकिन कोई चिकित्सक नहीं पहुंचा। लिहाजा वे मामले की शिकायत जिला विकास अधिकारी से कर चुके हैं। गुसाई ने कहा कि खेल महाकुंभ आयोजन की तैयारी के लिए जब जिलाधिकारी ने डीएम की अध्यक्षता में बैठक ली थी उस दौरान सीएमओ को चिकित्सकों की व्यवस्था करने को कहा गया था। सीएमओ साहब ने भी वादा किया था कि पूरी प्रतियोगिता के दौरान चिकित्सक मैदान पर एंबुलेंस समेत उपलब्ध रहेंगे।

ऐसे में इस बात को आसानी से समझा जा सकता है कि जिस राज्य के सरकारी अस्पतालों में अपने फर्ज की परवाह करने वाले, सातवें वेतन का लुत्फ लेने वाले कर्तव्यपरायण चिकित्सक तैनात हों, वहां की जनता आखिर क्यों नहीं निजी अस्पतालों में जाने को मजबूर होगी। चुभने वाली बात ये है कि स्वास्थ्य महकमें की जिम्मेदारी खुद सूबे के मुखिया उठा रहे हैं।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here