जानिए, वन रक्षक भर्ती घपले मामले में किसके खिलाफ कार्रवाई को लिखा टाइगर रिजर्व के निदेशक ने!

साल 2015 में फर्जी प्रमाण पत्रों के जरिए राजाजी टाइगर रिजर्व में वन रक्षक चयन मामले की परतें धीरे-धीरे उधड़ तो रही हैं लेकिन जिस तेजी से कार्रवाई का चाबुक फटकारा जाना चाहिए उस तेजी से एक्शन नहीं लिया जा रहा है। आलम ये है कि तीन महीने बाद भी इससे जुड़े अधिकारी जांच में फर्जीवाड़े की पुष्टि होने के बाद भी कार्रवाई से कतरा रहे हैं।
हालांकि, इस हीलाहवाली की आंच अब टाइगर रिजर्व के वार्डन (हरिद्वार) कोमल सिंह पर आती दिख रही है। टाइगर रिजर्व के निदेशक सनातन सोनकर ने प्रमुख मुख्य वन संरक्षक को पत्र लिखकर वार्डन के खिलाफ कार्रवाई करने को कहा है।
गौरतलब है कि साल 2015 में राजाजी टाइगर रिजर्व में मस्टररोल पर काम कर रहे कर्मचारियों को वन रक्षक पद पर भर्ती करने की प्रक्रिया शुरू की गई थी। तमाम कर्मचारी इसमें चयनित भी हो गए थे, लेकिन बाद में जब यह शिकायत मिली कि कई अभ्यर्थियों ने विभिन्न रेंज में कार्य के फर्जी प्रमाण पत्र लगाए हैं, तो भर्ती प्रक्रिया निरस्त कर दी गई।
हालांकि, इसके विरोध में 21 अभ्यर्थी कोर्ट चले गए। बीते साल के सितंबर माह में जब अपर प्रमुख वन संरक्षक वीके पांगती ने प्रकरण की जांच की तो पता चला कि 16 अभ्यर्थियों के कार्य के प्रमाण पत्र हरिद्वार के तत्कालीन वन क्षेत्रधिकारी बृज बिहारी शर्मा ने जारी किए हैं। जांच में पाया गया कि ये रिकॉर्ड मूल रोकड़ बही के पृष्ठों को फाड़कर दूसरे पृष्ठ जोड़े गए हैं। इसी तरह धौलखंड रेंज से भी गड़बड़ी पाई गई है।  जांच में यह भी उल्लेख किया गया कि इस भर्ती प्रक्रिया के मूल अभिलेख तत्कालीन उप वन संरक्षक किशन चंद ने उपलब्ध ही नहीं कराए। तमाम तथ्यों की पड़ताल के बाद ही जांच में फर्जी प्रमाण पत्र दाखिल करने वाले अभ्यर्थियों पर एफआइआर दर्ज करने की संस्तुति की गई थी।
इसी क्रम में राजाजी टाइगर रिजर्व के निदेशक सनातन ने वार्डन कोमल सिंह को एफआइआर करने के निर्देश दिए थे। करीब तीन माह बाद भी जब इस दिशा में कोई कार्रवाई नहीं की गई तो अब उन्होंने प्रमुख मुख्य वन संरक्षक को पत्र लिखकर निर्देश का पालन न करने वाले वार्डन के खिलाफ उचित कार्रवाई करने को कहा है।
राजाजी टाइगर रिजर्व के निदेशक सनातन सोनकर का कहना है कि एफआइआर कराए बिना इस मसले से पर्दा उठना संभव नहीं। क्योंकि राजाजी टाइगर रिजर्व में फर्जीवाड़े का यह मामला सिर्फ फर्जी कार्य प्रमाण पत्र तक ही सीमित नहीं है, बल्कि अधिकारियों की नीयत का सवाल भी है कि आखिर किन अधिकारियों ने बिना कार्य के ऐसे प्रमाण पत्र तैयार कर दिए।

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