1835 से लेकर आज तक दुविधा की स्थिती में है असम राइफल्स,अपने हक के लिए लड़ने को मजबूर

देहरादून- असम रायफल्स भारत के अर्धसैनिक बलों में सबसे पुराना और महत्वपूर्ण बल है। जो आज अपने हकों के लिए लड़ने पर मजबूर है। यह देश की विडम्बना ही है की जो देश की रक्षा कर रही है। उन्हें ही किसी प्रकार की प्रशासन द्वारा सुविधाएं प्राप्त नहीं है। हद तो यह है की लम्बे समय से अपने हक़ों के लिए लड़ रही सेना के हित में सुप्रीम कोर्ट द्वारा फैसला सुनाया जाता है तो भी मंत्रालय उसे लागू नहीं करता।पिछले 02 वर्षों से बल द्वारा PM मोदी से अपनी समस्याओं को लेकर भेट के लिए भी संघर्ष किया जा रहा है लेकिन यहां भी इनकी अनदेखी हो रही है।

यह बल देश के पूर्वोत्तर भाग में भारतीय सेना के साथ मिलकर रक्षा मंत्रालय के अधीन समान रूप से निष्ठापूर्वक सैन्य गतिविधियों में एवं आंतरिक सुरक्षा का कार्य कर रहा है, लेकिन वेतन, भत्ते ,युद्ध सामग्री और कलयाणकारी सुविधाओं के लिए यह गृहमंत्रालय के अधीन है। जिससे यह दोहरी कमान के अधीन कार्य करता है और दोहरी कमान में होने के कारण इन्हे कई प्रकार की सुविधाओं से वंचित कर दिया है। रक्षा मंत्रालय कहता है की यह ग्रह मंत्रालय के अंतर्गत है और ग्रह मंत्रालय कहता है कि यह रक्षा मंत्रालय के अंतर्गत है। जिस कारण बल के जवानों के साथ सौतेला व्यवहार किया जाता है और उन्हें के हकों से महरूम रखा जाता है।

असम राइफल्स का गठन 1835 में कच्छार लेवी के नाम से किया गया

आपको बता दें की असम राइफल्स का गठन 1835 में कच्छार लेवी के नाम से किया गया था। यह बल धैर्यपूर्वक कठिनाइयां का सामना करते हुये दुर्गम सरहदी इलाकों को प्रशासन के नियंत्रण में लाया। इस बल के नाम को कई बार बदला गया जैसे कच्छार लेवी, फ्रंटियर पुलिस, असम मिलट्रि पुलिस और असम राइफल्स। भारत बर्मा सीमा पर असम राइफल्स को जपानी हमले और उनके मजबूत संचार साधनों को विफल करने के लिए प्रतिरोधी दस्ते बनाए गये, यह सारी योजना “प्लान वी ” में निहित थी इसीलिए इस बेमीसाल कार्य की वजह से गौरवान्वित हुई।

असम राइफल्स ने बर्मा इलाके का भीतर स्थित दुश्मन की नियंत्रण सीमा रेखा बहादुरी से फौजी कार्यवाहियां की, बाद में उसने कोहिमा से उखरुल तक बनाई गई दुश्मनो की सुरक्षा चौकियों का भी कडा मुकाबला किया। लुशाई बिग्रेड की पहली बटालियन ने जोखिम उठाकर चीनी पहाड़ियों में जपानियों का डटकर मुकाबला किया।

इस प्रकार इन सैन्य अभियानों में इस फौज ने सहयोगी सेना कि तरह कार्य किया। युध्द के समाप्त होने तक पांचो बटालियन के आॅफिसर और जवानो ने अपनी श्रेष्ठता और शौर्य के प्रदर्शन से 48 पुरस्कार प्राप्त करते हुये अपनी पहचान बना ली थी। उत्तर पुर्वाचंल के आदिवासी इलाकों में लंबी तैनाती की वजह से यह बल यहां के लोगों में बहुत लोकप्रिय हो गया।इस बल ने शिक्षा,निर्माण,कृषि और पशुपालन जैसी कई विकास संम्बधी कार्य किए और यहां अल्प विकसित जनता को राष्टजीवन कि मुख्यधारा में शामिल किया। असम राइफल्स के जवान अपनी जोखिम भरी जिंदगी खतरनाक जंगल और पहाड़ी इलाकों में गुजारते है। जोखिम उठाने कि इस भावना में असम राइफल्स को हिमांचल में प्रर्वता रोहण के लिए प्रेरित किया गया जिसमें सन 1980 में ग्रुदोंगमा शिखर और 1984 में कामेत शिखर का सफल अभियान प्रमुख है। असम राइफल्स सन 1947 तक आसाम राज्य के महानिरिक्षक के अधीन हुआ करती थी और भारत स्वतंत्रता के बाद असम राइफल्स ने 879 पदक हासिल किये जिसमें 4 अशोक चक्र, 34 र्किती चक्र, 5 वीर चक्र, 10 परम विशिष्ट सेवा पदक, 4 अतिविशिष्ट सेवा मेडल, 139  शौर्य चक्र , 1524 गवर्नर द्वारा प्रदत स्वर्ण पदक तथा 105 प्रशंसा पत्र , 5749 महानिदेशक असम राइफल्स प्रशंसा पत्र शामिल है।

असम राइफल्स कानून और व्यवस्था को बनाए रखते हुए सीमा की चौकसी में भी प्रगति करती जा रही है। इसका आदर्श अपने में अकेला है। असम के राज्यपाल के जनजातियों से संबंधित मामलोके एक भूतपूर्व सलाहकार डॉ. बैरियर एल्विन के अनुसार “असम राइफल्स” के लोग कानून व्यवस्था के सरंक्षक दूर-दराज के इलाको में जाने में अगुवाई करने वाले हमारी सरहदों के पहरेदार और पर्वत वासियोंके मित्र हैं। जिन्होने विनम्रता और बिना शोर शराबे के हर तरह की कठिनाईयां और मुश्किले झेली है।मुश्किल से मुश्किल इलाको के हजारो गांववाले उनके लिए स्नेह और कृतज्ञता की भावना रखते है। अब सवाल यह उठता है कि, असम राइफल्स 1835 से लेकर आज तक दुविधा स्थिती में है। आज कि वर्तमान सरकार क्या असम राइफल्स के निम्न मूल भूत हक़ और अधिकार दे सकती है।

यह है मांगे

दोहरी कमान्ड से मुक्ती ?

 2004 के बाद भर्ती हुये जवानों को पेन्शन ?

 ऑल इडिया पोष्टिग ?

 ई० सी० एच० एस० सुविधा ?

दरअसल असम राइफल्स अपने ऊपर दोहरे नियंत्रण के खिलाफ लड़ाई लड़ रही है जिसके लिए वह वर्षों से संघर्षरत है। पूर्व सूबेदार वी.टी. नायर द्वारा दायर याचिका में मांग की गई कि भारत के सबसे पुराने अर्द्धसैनिक बल असम राइफल्स का नियंत्रण इसमें से किसी एक मंत्रालय को सौंपा जाए क्योंकि दोहरा नेतृत्व प्रशासनिक समस्याएं पैदा कर रहा है जिन पर गौर नहीं किया जा रहा। अधिवक्ता अभिषेक कुमार चौधरी के जरिये दायर याचिका में कहा गया, पिछले वर्षों में, कुछ प्रशासनिक समस्याएं सामने आई हैं और इन पर असरदार तरीके से गौर नहीं किया जा सका।

गृह मंत्रालय ने बल पर नियंत्रण करने में हमेशा मुश्किलों का सामना किया क्योंकि इसमें सेना के अधिकारी और जवान हैं जो रक्षा मंत्रालय के अधीन हैं।असम राइफल्स की मांग यह भी है की जब वह भारतीय सेना के समान कार्य करता है तो उसे सेना के समान ही वेतन और मूलभूत सुविधाएं प्राप्त होनी चाहिए। इसके लिए वह लम्बे समय से पत्रों और सोशल मीडिया के माध्यम से PM मोदी से मिलने के लिए भी संघर्षरत है परन्तु उनकी मुलाकात नहीं हो पा रही है। असम राइफल्स ने अपनी मांगों और समस्याओं को मंत्रालय से लेकर आलाअफसरों तक सबके समक्ष रखा है जिसमे , प्रत्येक ने यह ही कहा है कि असम राइफल्स को रक्षा मंत्रालय के अधीन करना चाहिए।बल लम्बे समय से सोशल मीडिया पर भी अपनी आवाज़ बुलंद कर आम जन का समर्थन मांगने को मजबूर है क्योंकि मंत्रालय उन्हें दोहरे नियंत्रण के कारण यह कहकर टाल देता है वह कुछ नहीं कर सकता है। आपको यह जानकर हैरानी होगी की इतनी पुरानी सेना होने के बावजूद भी सेना को मिलने वाली स्वास्थ्य सेवाएं ( आर्मी अस्पतालों ) की सुविधा भी प्राप्त नहीं है। इसके लिए सुप्रीम कोर्ट ने 9 फरवरी में आदेश भी दिया था की असम राइफल्स को आर्मी के समान ही स्वास्थ्य सेवाएं दी जाएं परन्तु मंत्रालय ने अभी उस आदेश का पालन तक नहीं किया है।

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